॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.39
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः॥ ३९
janma tvātmatayā puṃsaḥ sarvabhāvena bhūrida|
viṣayasvīkṛtiṃ prāhuryathā svapnamanorathaḥ|| 39
अर्थ
उदार उद्धव! जब यह जीव किसी भी शरीरको अभेद-भावसे ‘मैं’ के रूपमें स्वीकार कर लेता है, तब उसे ही जन्म कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्नकालीन और मनोरथकालीन शरीरमें अभिमान करना ही स्वप्न और मनोरथ कहा जाता है॥ ३९॥