श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.54

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।

स्वप्नदृष्टाश्‍च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः॥ ५४

yathā manorathadhiyo viṣayānubhavo mṛṣā|

svapnadṛṣṭāśca dāśārha tathā saṃsāra ātmanaḥ|| 54

अर्थ

जैसे नदी-तालाब आदिके जलके हिलने या चंचल होनेपर उसमें प्रतिबिम्बित तटके वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते-से जान पड़ते हैं, जैसे घुमाये जानेवाले नेत्रके साथ-साथ पृथ्वी भी घूमती हुई-सी दिखायी देती है, जैसे मनके द्वारा सोचे गये तथा स्वप्नमें देखे गये भोग पदार्थ सर्वथा अलीक ही होते हैं, वैसे ही हे दाशार्ह! आत्माका विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ही है॥ ५३-५४॥

यह अर्थ श्लोक 53–54 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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