प्रिय उद्धव! इसलिये इन दुष्ट (कभी तृप्त न होनेवाली) इन्द्रियोंसे विषयोंको मत भोगो। आत्मविषयक अज्ञानसे प्रतीत होनेवाला सांसारिक भेद-भाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो॥ ५६॥✎ 1764
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ ५६
प्रिय उद्धव! इसलिये इन दुष्ट (कभी तृप्त न होनेवाली) इन्द्रियोंसे विषयोंको मत भोगो। आत्मविषयक अज्ञानसे प्रतीत होनेवाला सांसारिक भेद-भाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 854) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)