श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.58

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पितः।

श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत्॥ ५८

niṣṭhito mūtrito vājñairbahudhaivaṃ prakampitaḥ|

śreyaskāmaḥ kṛcchragata ātmanā''tmānamuddharet|| 58

अर्थ

असाधु पुरुष गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दें, वाणीद्वारा अपमान करें, उपहास करें, निन्दा करें, मारें-पीटें, बाँधें, आजीविका छीन लें, ऊपर थूक दें, मूत दें अथवा तरह-तरहसे विचलित करें, निष्ठासे डिगानेकी चेष्टा करें; उनके किसी भी उपद्रवसे क्षुब्ध न होना चाहिये; क्योंकि वे तो बेचारे अज्ञानी हैं, उन्हें परमार्थका तो पता ही नहीं है। अतः जो अपने कल्याणका इच्छुक है, उसे सभी कठिनाइयोंसे अपनी विवेक-बुद्धिद्वारा ही—किसी बाह्य साधनसे नहीं—अपनेको बचा लेना चाहिये। वस्तुतः आत्म-दृष्टि ही समस्त विपत्तियोंसे बचनेका एकमात्र साधन है॥ ५७-५८॥✎ 1764

यह अर्थ श्लोक 57–58 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1764 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-विषयक → आत्मविषयक

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