पुरुषशिरोमणे! तत्त्वोंका एक-दूसरेमें अनुप्रवेश है, इसलिये वक्ता तत्त्वोंकी जितनी संख्या बतलाना चाहता है, उसके अनुसार कारणको कार्यमें अथवा कार्यको कारणमें मिलाकर अपनी इच्छित संख्या सिद्ध कर लेता है॥ ७॥✎ 1762
परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।
पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम्॥ ७
पुरुषशिरोमणे! तत्त्वोंका एक-दूसरेमें अनुप्रवेश है, इसलिये वक्ता तत्त्वोंकी जितनी संख्या बतलाना चाहता है, उसके अनुसार कारणको कार्यमें अथवा कार्यको कारणमें मिलाकर अपनी इच्छित संख्या सिद्ध कर लेता है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 846) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)