श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।

भेदो वैरमविश्‍वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८

steyaṃ hiṃsānṛtaṃ dambhaḥ kāmaḥ krodhaḥ smayo madaḥ|

bhedo vairamaviśvāsaḥ saṃspardhā vyasanāni ca|| 18

अर्थ

चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अविश्‍वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जूआ और शराब—ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनके कारण ही माने गये हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थके विरोधी अर्थनामधारी अनर्थको दूरसे ही छोड़ दे॥ १८-१९॥

यह अर्थ श्लोक 18–19 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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