श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

मनो गुणान् वै सृजते बलीय-

स्ततश्‍च कर्माणि विलक्षणानि।

शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि

तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति॥ ४४

mano guṇān vai sṛjate balīya-

stataśca karmāṇi vilakṣaṇāni|

śuklāni kṛṣṇānyatha lohitāni

tebhyaḥ savarṇāḥ sṛtayo bhavanti|| 44

अर्थ

सचमुच यह मन बहुत बलवान् है। इसीने विषयों, उनके कारण गुणों और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्तियोंकी सृष्टि की है। उन वृत्तियोंके अनुसार ही सात्त्विक, राजस और तामस—अनेकों प्रकारके कर्म होते हैं और कर्मोंके अनुसार ही जीवकी विविध गतियाँ होती हैं॥ ४४॥

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