श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

दानं स्वधर्मो नियमो यमश्‍च

श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।

सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः

परो हि योगो मनसः समाधिः॥ ४६

dānaṃ svadharmo niyamo yamaśca

śrutaṃ ca karmāṇi ca sadvratāni|

sarve manonigrahalakṣaṇāntāḥ

paro hi yogo manasaḥ samādhiḥ|| 46

अर्थ

दान, अपने धर्मका पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत—इन सबका अन्तिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाय, भगवान्‌में लग जाय। मनका समाहित हो जाना ही परम योग है॥ ४६॥

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