श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा

मनश्‍च नान्यस्य वशं समेति।

भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान्

युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८

manovaśe'nye hyabhavan sma devā

manaśca nānyasya vaśaṃ sameti|

bhīṣmo hi devaḥ sahasaḥ sahīyān

yuñjyād vaśe taṃ sa hi devadevaḥ|| 48

अर्थ

सभी इन्द्रियाँ मनके वशमें हैं। मन किसी भी इन्द्रियके वशमें नहीं है। यह मन बलवान्से भी बलवान्, अत्यन्त भयंकर देव है। जो इसको अपने वशमें कर लेता है, वही देव-देव—इन्द्रियोंका विजेता है॥ ४८॥

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