श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.56

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्

किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।

ना‌ग्‍नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात्

क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम्॥ ५६

kālastu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet

kimātmanastatra tadātmako'sau|

nāgnerhi tāpo na himasya tat syāt

krudhyeta kasmai na parasya dvandvam|| 56

अर्थ

यदि ऐसा मानें कि काल ही सुख-दुःखका कारण है, तो आत्मापर उसका क्या प्रभाव? क्योंकि काल तो आत्मस्वरूप ही है। जैसे आग आगको नहीं जला सकती और बर्फ बर्फको नहीं गला सकता, वैसे ही आत्मस्वरूप काल अपने आत्माको ही सुख-दुःख नहीं पहुँचा सकता। फिर किसपर क्रोध किया जाय? आत्मा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत है॥ ५६॥

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