श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.24.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।

मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्‍नीवार्कोदये तमः॥ २८

evamanvīkṣamāṇasya kathaṃ vaikalpiko bhramaḥ|

manaso hṛdi tiṣṭheta vyomnīvārkodaye tamaḥ|| 28

अर्थ

उद्धवजी! जो इस प्रकार विवेकदृष्टिसे देखता है उसके चित्तमें यह प्रपंचका भ्रम हो ही नहीं सकता। यदि कदाचित् उसकी स्फूर्ति हो भी जाय तो वह अधिक कालतक हृदयमें ठहर कैसे सकता है? क्या सूर्योदय होनेपर भी आकाशमें अन्धकार ठहर सकता है॥ २८॥

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