श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्‍चाशयसम्भवैः।

मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्‍चरेत्॥ ३६

jīvo jīvavinirmukto guṇaiścāśayasambhavaiḥ|

mayaiva brahmaṇā pūrṇo na bahirnāntaraścaret|| 36

अर्थ

जीव लिंगशरीररूप अपनी उपाधि जीवत्वसे तथा अन्तःकरणमें उदय होनेवाली सत्त्वादि गुणोंकी वृत्तियोंसे मुक्त होकर मुझ ब्रह्मकी अनुभूतिसे एकत्वदर्शनसे पूर्ण हो जाता है और वह फिर बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी विषयमें नहीं जाता॥ ३६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः

॥ २५॥

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