श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा।

किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ १२

kiṃ vidyayā kiṃ tapasā kiṃ tyāgena śrutena vā|

kiṃ viviktena maunena strībhiryasya mano hṛtam|| 12

अर्थ

स्त्रीने जिसका मन चुरा लिया, उसकी विद्या व्यर्थ है। उसे तपस्या, त्याग और शास्त्राभ्याससे भी कोई लाभ नहीं। और इसमें सन्देह नहीं कि उसका एकान्तसेवन और मौन भी निष्फल है॥ १२॥

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