श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः।

सम्भवन्ति हिता नॄणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८

teṣu nityaṃ mahābhāga mahābhāgeṣu matkathāḥ|

sambhavanti hitā nṝṇāṃ juṣatāṃ prapunantyagham|| 28

अर्थ

परमभाग्यवान् उद्धवजी! संतोंके सौभाग्यकी महिमा कौन कहे? उनके पास सदा-सर्वदा मेरी लीला-कथाएँ हुआ करती हैं। मेरी कथाएँ मनुष्योंके लिये परम हितकर हैं; जो उनका सेवन करते हैं, उनके सारे पाप-तापोंको वे धो डालती हैं॥ २८॥

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