॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.26.3
संगं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित्।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत्॥ ३
saṃgaṃ na kuryādasatāṃ śiśnodaratṛpāṃ kvacit|
tasyānugastamasyandhe patatyandhānugāndhavat|| 3
अर्थ
साधारण लोगोंको इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि जो लोग विषयोंके सेवन और उदरपोषणमें ही लगे हुए हैं, उन असत् पुरुषोंका संग कभी न करें; क्योंकि उनका अनुगमन करनेवाले पुरुषकी वैसी ही दुर्दशा होती है, जैसे अंधेके सहारे चलनेवाले अंधेकी। उसे तो घोर अन्धकारमें ही भटकना पड़ता है॥ ३॥