श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अस्थिरायां विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।

स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४

asthirāyāṃ vikalpaḥ syāt sthaṇḍile tu bhaved dvayam|

snapanaṃ tvavilepyāyāmanyatra parimārjanam|| 14

अर्थ

चल प्रतिमाके सम्बन्धमें विकल्प है। चाहे करे और चाहे न करे। परन्तु बालुकामयी प्रतिमामें तो आवाहन और विसर्जन प्रतिदिन करना ही चाहिये। मिट्टी और चन्दनकी तथा चित्रमयी प्रतिमाओंको स्नान न करावे, केवल मार्जन कर दे; परन्तु और सबको स्नान कराना चाहिये॥ १४॥

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