॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.27.16
स्नानालंकरणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः॥ १६
snānālaṃkaraṇaṃ preṣṭhamarcāyāmeva tūddhava|
sthaṇḍile tattvavinyāso vahnāvājyaplutaṃ haviḥ|| 16
अर्थ
उद्धवजी! स्नान, वस्त्र, आभूषण आदि तो पाषाण अथवा धातुकी प्रतिमाके पूजनमें ही उपयोगी हैं। बालुकामयी मूर्ति अथवा मिट्टीकी वेदीमें पूजा करनी हो तो उसमें मन्त्रोंके द्वारा अंग और उसके प्रधान देवताओंकी यथास्थान पूजा करनी चाहिये। तथा अग्निमें पूजा करनी हो तो घृतमिश्रित हवन-सामग्रियोंसे आहुति देनी चाहिये॥ १६॥