श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः।

आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्तांगं मां प्रपूजयेत्॥ २४

tayā''tmabhūtayā piṇḍe vyāpte sampūjya tanmayaḥ|

āvāhyārcādiṣu sthāpya nyastāṃgaṃ māṃ prapūjayet|| 24

अर्थ

वह जीवकला आत्म-स्वरूपिणी है। जब उसके तेजसे सारा अन्तःकरण और शरीर भर जाय तब मानसिक उपचारोंसे मन-ही-मन उसकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर तन्मय होकर मेरा आवाहन करे और प्रतिमा आदिमें स्थापना करे। फिर मन्त्रोंके द्वारा अंगन्यास करके उसमें मेरी पूजा करे॥ २४॥✎ 1766 1767

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1766 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जीव-कलाका → जीवकलाका
  • #1767 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्राण-वायु → प्राणवायु

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