वह जीवकला आत्म-स्वरूपिणी है। जब उसके तेजसे सारा अन्तःकरण और शरीर भर जाय तब मानसिक उपचारोंसे मन-ही-मन उसकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर तन्मय होकर मेरा आवाहन करे और प्रतिमा आदिमें स्थापना करे। फिर मन्त्रोंके द्वारा अंगन्यास करके उसमें मेरी पूजा करे॥ २४॥✎ 17661767
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्तांगं मां प्रपूजयेत्॥ २४
वह जीवकला आत्म-स्वरूपिणी है। जब उसके तेजसे सारा अन्तःकरण और शरीर भर जाय तब मानसिक उपचारोंसे मन-ही-मन उसकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर तन्मय होकर मेरा आवाहन करे और प्रतिमा आदिमें स्थापना करे। फिर मन्त्रोंके द्वारा अंगन्यास करके उसमें मेरी पूजा करे॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 878) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)