श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

एतत् कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम्।

भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्‍वेश्‍वरेश्‍वर॥ ५

etat kamalapatrākṣa karmabandhavimocanam|

bhaktāya cānuraktāya brūhi viśveśvareśvara|| 5

अर्थ

कमलनयन श्यामसुन्दर! आप शंकर आदि जगदीश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं और मैं आपके चरणोंका प्रेमी भक्त हूँ। आप कृपा करके मुझे यह कर्मबन्धनसे मुक्त करनेवाली विधि बतलाइये॥ ५॥✎ 1765

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1765 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें