श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम्।

पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान्॥ ५०

madarcāṃ sampratiṣṭhāpya mandiraṃ kārayed dṛḍham|

puṣpodyānāni ramyāṇi pūjāyātrotsavāśritān|| 50

अर्थ

यदि शक्ति हो तो उपासक सुन्दर और सुदृढ़ मन्दिर बनवाये और उसमें मेरी प्रतिमा स्थापित करे। सुन्दर-सुन्दर फूलोंके बगीचे लगवा दे; नित्यकी पूजा, पर्वकी यात्रा और बड़े-बड़े उत्सवोंकी व्यवस्था कर दे॥ ५०॥✎ 1769

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1769 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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