श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

करोति कर्म क्रियते च जन्तुः

केनाप्यसौ चोदित आनिपातात्।

न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि

निवृत्ततृष्णः स्वसुखानुभूत्या॥ ३०

karoti karma kriyate ca jantuḥ

kenāpyasau codita ānipātāt|

na tatra vidvān prakṛtau sthito'pi

nivṛttatṛṣṇaḥ svasukhānubhūtyā|| 30

अर्थ

उद्धवजी! जीव संस्कार आदिसे प्रेरित होकर जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त कर्ममें ही लगा रहता है और उनमें इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि करके हर्ष-विषाद आदि विकारोंको प्राप्त होता रहता है। परन्तु जो तत्त्वका साक्षात्कार कर लेता है, वह प्रकृतिमें स्थित रहनेपर भी संस्कारा-नुसार कर्म होते रहनेपर भी उनमें इष्ट-अनिष्ट-बुद्धि करके हर्ष-विषाद आदि विकारोंसे युक्त नहीं होता; क्योंकि आनन्दस्वरूप आत्माके साक्षात्कारसे उसकी संसारसम्बन्धी सभी आशा-तृष्णाएँ पहले ही नष्ट हो चुकी होती हैं॥ ३०॥

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