श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं

नानानुमानेन विरुद्धमन्यत्।

न मन्यते वस्तुतया मनीषी

स्वाप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम्॥ ३२

yadi sma paśyatyasadindriyārthaṃ

nānānumānena viruddhamanyat|

na manyate vastutayā manīṣī

svāpnaṃ yathotthāya tirodadhānam|| 32

अर्थ

यदि ज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें इन्द्रियोंके विविध बाह्य विषय, जो कि असत् हैं, आते भी हैं तो वह उन्हें अपने आत्मासे भिन्‍न नहीं मानता, क्योंकि वे युक्तियों, प्रमाणों और स्वानुभूतिसे सिद्ध नहीं होते। जैसे नींद टूट जानेपर स्वप्नमें देखे हुए और जागनेपर तिरोहित हुए पदार्थोंको कोई सत्य नहीं मानता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी अपनेसे भिन्‍न प्रतीयमान पदार्थोंको सत्य नहीं मानते॥ ३२॥✎ 1452

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1452 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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