॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.28.6
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः॥ ६✎ 1232
ātmaiva tadidaṃ viśvaṃ sṛjyate sṛjati prabhuḥ|
trāyate trāti viśvātmā hriyate haratīśvaraḥ|| 6
अर्थ
उद्धवजी! जो कुछ प्रत्यक्ष या परोक्ष वस्तु है, वह आत्मा ही है। वही सर्वशक्तिमान् भी है। जो कुछ विश्व-सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसका वह निमित्त-कारण तो है ही, उपादान-कारण भी है। अर्थात् वही विश्व बनता है और वही बनाता भी है, वही रक्षक है और रक्षित भी वही है। सर्वात्मा भगवान् ही इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है , वह भी वे ही हैं॥ ६॥✎ 1770