श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

आत्मैव तदिदं विश्‍वं सृज्यते सृजति प्रभुः।

त्रायते त्राति विश्‍वात्मा ह्रियते हरतीश्‍वरः॥ ६✎ 1232

ātmaiva tadidaṃ viśvaṃ sṛjyate sṛjati prabhuḥ|

trāyate trāti viśvātmā hriyate haratīśvaraḥ|| 6

अर्थ

उद्धवजी! जो कुछ प्रत्यक्ष या परोक्ष वस्तु है, वह आत्मा ही है। वही सर्वशक्तिमान् भी है। जो कुछ विश्‍व-सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसका वह निमित्त-कारण तो है ही, उपादान-कारण भी है। अर्थात् वही विश्‍व बनता है और वही बनाता भी है, वही रक्षक है और रक्षित भी वही है। सर्वात्मा भगवान् ही इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है , वह भी वे ही हैं॥ ६॥✎ 1770

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1232 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृियते → ह्रियते
  • #1770 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परमार्थ-दृष्टिसे → परमार्थदृष्टिसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें