उद्धवजी! तुमसे मैंने ज्ञान और विज्ञानकी उत्तम स्थितिका वर्णन किया है। जो पुरुष मेरे इन वचनोंका रहस्य जान लेता है वह न तो किसीकी प्रशंसा करता है और न निन्दा। वह जगत्में सूर्यके समान समभावसे विचरता रहता है॥ ८॥✎ 1770
एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम्।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत्॥ ८
उद्धवजी! तुमसे मैंने ज्ञान और विज्ञानकी उत्तम स्थितिका वर्णन किया है। जो पुरुष मेरे इन वचनोंका रहस्य जान लेता है वह न तो किसीकी प्रशंसा करता है और न निन्दा। वह जगत्में सूर्यके समान समभावसे विचरता रहता है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.28.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 884) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/28/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)