श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्।

मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव।

अतिव्रज्य गतीस्तिस्रो मामेष्यसि ततः परम्॥ ४४

matto'nuśikṣitaṃ yatte viviktamanubhāvayan|

mayyāveśitavākcitto maddharmanirato bhava|

ativrajya gatīstisro māmeṣyasi tataḥ param|| 44

अर्थ

मैंने तुम्हें जो कुछ शिक्षा दी है, उसका एकान्तमें विचारपूर्वक अनुभव करते रहना। अपनी वाणी और चित्त मुझमें ही लगाये रहना और मेरे बतलाये हुए भागवतधर्ममें प्रेमसे रम जाना। अन्तमें तुम त्रिगुण और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली गतियोंको पार करके उनसे परे मेरे परमार्थस्वरूपमें मिल जाओगे॥ ४४॥✎ 1771

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1771 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गंगा-जलका → गंगाजलका

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