श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं

ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्।

कृष्णेन योगेश्‍वरसेविताङ्‌घ्रिणा

सच्छ्रद्धयाऽऽसेव्य जगद् विमुच्यते॥ ४८

ya etadānandasamudrasambhṛtaṃ

jñānāmṛtaṃ bhāgavatāya bhāṣitam|

kṛṣṇena yogeśvarasevitāṅghriṇā

sacchraddhayā''sevya jagad vimucyate|| 48

अर्थ

भगवान् शंकर आदि योगेश्‍वर भी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवा किया करते हैं। उन्होंने स्वयं श्रीमुखसे अपने परमप्रेमी भक्त उद्धवके लिये इस ज्ञानामृतका वितरण किया। यह ज्ञानामृत आनन्दमहासागरका सार है। जो श्रद्धाके साथ इसका सेवन करता है, वह तो मुक्त हो ही जाता है, उसके संगसे सारा जगत् मुक्त हो जाता है॥ ४८॥✎ 1772 1773

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1772 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्षीर-समुद्रसे → क्षीरसमुद्रसे
  • #1773 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उपदेशा-नुसार → उपदेशानुसार

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