श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश

ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः।

योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व-

न्‍नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ ६

naivopayantyapacitiṃ kavayastaveśa

brahmāyuṣāpi kṛtamṛddhamudaḥ smarantaḥ|

yo'ntarbahistanubhṛtāmaśubhaṃ vidhunva-

nnācāryacaityavapuṣā svagatiṃ vyanakti|| 6

अर्थ

भगवन्! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें अन्तर्यामीरूपसे और बाहर गुरुरूपसे स्थित होकर उनके सारे पाप-ताप मिटा देते हैं और अपने वास्तविक स्वरूपको उनके प्रति प्रकट कर देते हैं। बड़े-बड़े ब्रह्मज्ञानी ब्रह्माजीके समान लंबी आयु पाकर भी आपके उपकारोंका बदला नहीं चुका सकते। इसीसे वे आपके उपकारोंका स्मरण करके क्षण-क्षण अधिकाधिक आनन्दका अनुभव करते रहते हैं॥ ६॥

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