श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथ तृतीयोऽध्यायः

माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण

राजोवाच

परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।

मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः॥ १

parasya viṣṇorīśasya māyināmapi mohinīm|

māyāṃ veditumicchāmo bhagavanto bruvantu naḥ|| 1

अर्थ

राजा निमिने पूछा—भगवन्! सर्वशक्तिमान् परमकारण विष्णुभगवान्‌की माया बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस मायाका स्वरूप जानना चाहता हूँ, आपलोग कृपा करके बतलाइये॥ १॥✎ 1726

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1726 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: माया-वियोंको → मायावियोंको

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