उस समय शेषनाग—संकर्षणके मुँहसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकलती हैं और वायुकी प्रेरणासे वे लपटें पाताललोकसे जलाना आरम्भ करती हैं तथा और भी ऊँची-ऊँची होकर चारों ओर फैल जाती हैं—यह भगवान्की माया है॥ १०॥
पातालतलमारभ्य संकर्षणमुखानलः।
दहन्नूर्ध्वशिखो विष्वग् वर्धते वायुनेरितः॥ १०
उस समय शेषनाग—संकर्षणके मुँहसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकलती हैं और वायुकी प्रेरणासे वे लपटें पाताललोकसे जलाना आरम्भ करती हैं तथा और भी ऊँची-ऊँची होकर चारों ओर फैल जाती हैं—यह भगवान्की माया है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 723) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/10/