श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।

प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५

kālātmanā hṛtaguṇaṃ nabha ātmani līyate|

indriyāṇi mano buddhiḥ saha vaikārikairnṛpa|

praviśanti hyahaṃkāraṃ svaguṇairahamātmani|| 15

अर्थ

राजन्! तदनन्तर कालरूप ईश्‍वर आकाशके शब्द गुणको हरण कर लेता है जिससे वह तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि राजस अहंकारमें लीन होती हैं। मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्‍न देवताओंके साथ सात्त्विक अहंकारमें प्रवेश कर जाता है तथा अपने तीन प्रकारके कार्योंके साथ अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है। महत्तत्त्व प्रकृतिमें और प्रकृति ब्रह्ममें लीन होती है। फिर इसीके उलटे क्रमसे सृष्टि होती है—यह भगवान्‌की माया है॥ १५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें