श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ

न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।

सर्वत्र शश्‍वदनपाय्युपलब्धिमात्रं

प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८

nātmā jajāna na mariṣyati naidhate'sau

na kṣīyate savanavid vyabhicāriṇāṃ hi|

sarvatra śaśvadanapāyyupalabdhimātraṃ

prāṇo yathendriyabalena vikalpitaṃ sat|| 38

अर्थ

वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न मरता है। वह न तो बढ़ता है और न घटता ही है। जितने भी परिवर्तनशील पदार्थ हैं—चाहे वे क्रिया, संकल्प और उनके अभावके रूपमें ही क्यों न हों—सबकी भूत, भविष्यत् और वर्तमान सत्ताका वह साक्षी है। सबमें है। देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्‍न है, अविनाशी है। वह उपलब्धि करनेवाला अथवा उपलब्धिका विषय नहीं है। केवल उपलब्धिस्वरूप—ज्ञानस्वरूप है। जैसे प्राण तो एक ही रहता है, परन्तु स्थानभेदसे उसके अनेक नाम हो जाते हैं—वैसे ही ज्ञान एक होनेपर भी इन्द्रियोंके सहयोगसे उसमें अनेकताकी कल्पना हो जाती है॥ ३८॥

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