एक बार यही प्रश्न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकुके सामने ब्रह्माजीके मानस पुत्र सनकादि ऋषियोंसे पूछा था, परन्तु उन्होंने सर्वज्ञ होनेपर भी मेरे प्रश्नका उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था? कृपा करके मुझे बतलाइये॥ ४२॥
एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके।
नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम्॥ ४२
एक बार यही प्रश्न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकुके सामने ब्रह्माजीके मानस पुत्र सनकादि ऋषियोंसे पूछा था, परन्तु उन्होंने सर्वज्ञ होनेपर भी मेरे प्रश्नका उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था? कृपा करके मुझे बतलाइये॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 729) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/42/