॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.3.52
सांगोपांगां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः।
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः॥ ५२
sāṃgopāṃgāṃ sapārṣadāṃ tāṃ tāṃ mūrtiṃ svamantrataḥ|
pādyārghyācamanīyādyaiḥ snānavāsovibhūṣaṇaiḥ|| 52
अर्थ
अपने-अपने उपास्यदेवके विग्रहकी हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदोंसहित उसके मूलमन्त्रद्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि-अक्षतके* तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करे॥ ५२-५३॥
टिप्पणियाँ
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विष्णुभगवान्की पूजामें अक्षतोंका प्रयोग केवल तिलकालंकारमें ही करना चाहिये, पूजामें नहीं—‘नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुं न केतक्या महेश्वरम्।’