श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।

दिशो वितिमिराः कुर्वन् विधूम इव पावकः॥ २८

bibhraccaturbhujaṃ rūpaṃ bhrājiṣṇu prabhayā svayā|

diśo vitimirāḥ kurvan vidhūma iva pāvakaḥ|| 28

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने उस समय अपनी अंगकान्तिसे देदीप्यमान चतुर्भुज रूप धारण कर रखा था और धूमसे रहित अग्‍निके समान दिशाओंको अन्धकाररहित—प्रकाशमान बना रहे थे॥ २८॥✎ 1774

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1774 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: एकाग्र-चित्तसे → एकाग्रचित्तसे

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