उसने कहा—‘हे मधुसूदन! मैंने अनजानमें यह पाप किया है। सचमुच मैं बहुत बड़ा पापी हूँ; परन्तु आप परमयशस्वी और निर्विकार हैं। आप कृपा करके मेरा अपराध क्षमा कीजिये॥ ३५॥
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन।
क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमश्लोक मेऽनघ॥ ३५
उसने कहा—‘हे मधुसूदन! मैंने अनजानमें यह पाप किया है। सचमुच मैं बहुत बड़ा पापी हूँ; परन्तु आप परमयशस्वी और निर्विकार हैं। आप कृपा करके मेरा अपराध क्षमा कीजिये॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 901) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/35/