श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तन्माऽऽशु जहि वैकुण्ठ पाप्मानं मृगलुब्धकम्।

यथा पुनरहं त्वेवं न कुर्यां सदतिक्रमम्॥ ३७

tanmā''śu jahi vaikuṇṭha pāpmānaṃ mṛgalubdhakam|

yathā punarahaṃ tvevaṃ na kuryāṃ sadatikramam|| 37

अर्थ

वैकुण्ठनाथ! मैं निरपराध हरिणोंको मारनेवाला महापापी हूँ। आप मुझे अभी-अभी मार डालिये, क्योंकि मर जानेपर मैं फिर कभी आप-जैसे महापुरुषोंका ऐसा अपराध न करूँगा॥ ३७॥

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