श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये-

ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् ।

नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं

मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३

tathāpyaśeṣasthitisambhavāpyaye-

ṣvananyaheturyadaśeṣaśaktidhṛk |

naicchat praṇetuṃ vapuratra śeṣitaṃ

martyena kiṃ svasthagatiṃ pradarśayan|| 13

अर्थ

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारके निरपेक्ष कारण हैं और सम्पूर्ण शक्तियोंके धारण करनेवाले हैं तथापि उन्होंने अपने शरीरको इस संसारमें बचा रखनेकी इच्छा नहीं की। इससे उन्होंने यह दिखाया कि इस मनुष्य-शरीरसे मुझे क्या प्रयोजन है? आत्मनिष्ठ पुरुषोंके लिये यही आदर्श है कि वे शरीर रखनेकी चेष्टा न करें॥ १३॥

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