श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

रामपत्‍न्यश्‍च तद्देहमुपगुह्याग्‍निमाविशन्।

वसुदेवपत्‍न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्‍नादीन् हरेः स्नुषाः।

कृष्णपत्‍न्योऽविशन्‍नग्‍निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः॥ २०

rāmapatnyaśca taddehamupaguhyāgnimāviśan|

vasudevapatnyastadgātraṃ pradyumnādīn hareḥ snuṣāḥ|

kṛṣṇapatnyo'viśannagniṃ rukmiṇyādyāstadātmikāḥ|| 20

अर्थ

बलरामजीकी पत्‍नियाँ उनके शरीरको, वसुदेवजीकी पत्‍नियाँ उनके शवको और भगवान्‌की पुत्रवधुएँ अपने पतियोंकी लाशोंको लेकर अग्‍निमें प्रवेश कर गयीं। भगवान् श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि पटरानियाँ उनके ध्यानमें म‌ग्‍न होकर अग्‍निमें प्रविष्ट हो गयीं॥ २०॥✎ 1776 1777

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1776 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भगव-द्विरहसे → भगवद्विरहसे
  • #1777 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सँभाल-कर → सँभालकर

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