श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमंगलम्।

योगधारणयाऽऽ‌ग्‍नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६

lokābhirāmāṃ svatanuṃ dhāraṇādhyānamaṃgalam|

yogadhāraṇayā''gneyyādagdhvā dhāmāviśat svakam|| 6

अर्थ

भगवान्‌का श्रीविग्रह उपासकोंके ध्यान और धारणाका मंगलमय आधार और समस्त लोकोंके लिये परम रमणीय आश्रय है; इसलिये उन्होंने (योगियोंके समान) अग्‍निदेवतासम्बन्धी योगधारणाके द्वारा उसको जलाया नहीं, सशरीर अपने धाममें चले गये॥ ६॥

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