श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः

स्वौको विलङ्‌घ्य परमं व्रजतां पदं ते।

नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान्

धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि॥ १०

tvāṃ sevatāṃ surakṛtā bahavo'ntarāyāḥ

svauko vilaṅghya paramaṃ vrajatāṃ padaṃ te|

nānyasya barhiṣi balīn dadataḥ svabhāgān

dhatte padaṃ tvamavitā yadi vighnamūrdhni|| 10

अर्थ

आपके भक्त आपकी भक्तिके प्रभावसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीका उल्लंघन करके आपके परमपदको प्राप्त होते हैं। इसलिये जब वे भजन करने लगते हैं, तब देवतालोग तरह-तरहसे उनकी साधनामें विघ्न डालते हैं। किन्तु जो लोग केवल कर्मकाण्डमें लगे रहकर यज्ञादिके द्वारा देवताओंको बलिके रूपमें उनका भाग देते रहते हैं, उन लोगोंके मार्गमें वे किसी प्रकारका विघ्न नहीं डालते। परन्तु प्रभो! आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्थित की हुई विघ्न-बाधाओंसे गिरते नहीं। बल्कि आपके करकमलोंकी छत्रछायामें रहते हुए वे विघ्नोंके सिरपर पैर रखकर आगे बढ़ जाते हैं, अपने लक्ष्यसे च्युत नहीं होते॥ १०॥✎ 1727

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1727 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-पदको → परमपदको

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