श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः

प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।

मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो

गृह्णीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८

vijñāya śakrakṛtamakramamādidevaḥ

prāha prahasya gatavismaya ejamānān|

mā bhaiṣṭa bho madana māruta devavadhvo

gṛhṇīta no balimaśūnyamimaṃ kurudhvam|| 8

अर्थ

आदिदेव नर-नारायणने यह जानकर कि यह इन्द्रका कुचक्र है, भयसे काँपते हुए काम आदिकोंसे हँसकर कहा—उस समय उनके मनमें किसी प्रकारका अभिमान या आश्‍चर्य नहीं था। ‘कामदेव, मलय-मारुत और देवांगनाओ! तुमलोग डरो मत; हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। अभी यहीं ठहरो, हमारा आश्रम सूना मत करो’॥ ८॥✎ 1727

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1727 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-पदको → परमपदको

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें