श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः।

पशून् द्रुह्यन्ति विस्रब्धाः प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ १४

ye tvanevaṃvido'santaḥ stabdhāḥ sadabhimāninaḥ|

paśūn druhyanti visrabdhāḥ pretya khādanti te ca tān|| 14

अर्थ

जो इस विशुद्ध धर्मको नहीं जानते, वे घमंडी वास्तवमें तो दुष्ट हैं, परन्तु समझते हैं अपनेको श्रेष्ठ। वे धोखेमें पड़े हुए लोग पशुओंकी हिंसा करते हैं और मरनेके बाद वे पशु ही उन मारनेवालोंको खाते हैं॥ १४॥✎ 902 1732 1733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #902 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1732 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काल-भगवान् → कालभगवान्
  • #1733 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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