श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ये कैवल्यमसम्प्राप्ता ये चातीताश्‍च मूढताम्।

त्रैवर्गिका ह्यक्षणिका आत्मानं घातयन्ति ते॥ १६

ye kaivalyamasamprāptā ye cātītāśca mūḍhatām|

traivargikā hyakṣaṇikā ātmānaṃ ghātayanti te|| 16

अर्थ

जिन लोगोंने आत्मज्ञान सम्पादन करके कैवल्य-मोक्ष नहीं प्राप्त किया है और जो पूरे-पूरे मूढ़ भी नहीं हैं, वे अधूरे न इधरके हैं और न उधरके। वे अर्थ, धर्म, काम—इन तीनों पुरुषार्थोंमें फँसे रहते हैं, एक क्षणके लिये भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती। वे अपने हाथों अपने पैरोंमें कुल्हाड़ी मार रहे हैं। ऐसे ही लोगोंको आत्मघाती कहते हैं॥ १६॥✎ 902 1732 1733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #902 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1732 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काल-भगवान् → कालभगवान्
  • #1733 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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