श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्‍वरम्।

नानातन्त्रविधानेन कलावपि यथा शृणु॥ ३१

iti dvāpara urvīśa stuvanti jagadīśvaram|

nānātantravidhānena kalāvapi yathā śṛṇu|| 31

अर्थ

राजन्! द्वापरयुगमें इस प्रकार लोग जगदीश्‍वर भगवान्‌की स्तुति करते हैं। अब कलियुगमें अनेक तन्त्रोंके विधि-विधानसे भगवान्‌की जैसी पूजा की जाती है, उसका वर्णन सुनो—॥ ३१॥

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