श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं

धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।

मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्

वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ ३४

tyaktvā sudustyajasurepsitarājyalakṣmīṃ

dharmiṣṭha āryavacasā yadagādaraṇyam|

māyāmṛgaṃ dayitayepsitamanvadhāvad

vande mahāpuruṣa te caraṇāravindam|| 34

अर्थ

भगवन्! आपके चरणकमलोंकी महिमा कौन कहे? रामावतारमें अपने पिता दशरथजीके वचनोंसे देवताओंके लिये भी वांछनीय और दुस्त्यज राज्यलक्ष्मीको छोड़कर आपके चरण-कमल वन-वन घूमते फिरे! सचमुच आप धर्मनिष्ठताकी सीमा हैं। और महापुरुष! अपनी प्रेयसी सीताजीके चाहनेपर जान-बूझकर आपके चरणकमल मायामृगके पीछे दौड़ते रहे। सचमुच आप प्रेमकी सीमा हैं। प्रभो! मैं आपके उन्हीं चरणारविन्दोंकी वन्दना करता हूँ’॥ ३४॥✎ 1734 1735

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1734 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-लक्ष्मीको → राज्यलक्ष्मीको
  • #1735 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कृष्ण-वर्ण—काले → कृष्णवर्ण—काले

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