देहाभिमानी जीव संसारचक्रमें अनादि कालसे भटक रहे हैं। उनके लिये भगवान्की लीला, गुण और नामके कीर्तनसे बढ़कर और कोई परम लाभ नहीं है; क्योंकि इससे संसारमें भटकना मिट जाता है और परम शान्तिका अनुभव होता है॥ ३७॥✎ 1736
न ह्यतः परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह।
यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृतिः॥ ३७
देहाभिमानी जीव संसारचक्रमें अनादि कालसे भटक रहे हैं। उनके लिये भगवान्की लीला, गुण और नामके कीर्तनसे बढ़कर और कोई परम लाभ नहीं है; क्योंकि इससे संसारमें भटकना मिट जाता है और परम शान्तिका अनुभव होता है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 742) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/5/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)