श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न ह्यतः परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह।

यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृतिः॥ ३७

na hyataḥ paramo lābho dehināṃ bhrāmyatāmiha|

yato vindeta paramāṃ śāntiṃ naśyati saṃsṛtiḥ|| 37

अर्थ

देहाभिमानी जीव संसारचक्रमें अनादि कालसे भटक रहे हैं। उनके लिये भगवान्‌की लीला, गुण और नामके कीर्तनसे बढ़कर और कोई परम लाभ नहीं है; क्योंकि इससे संसारमें भटकना मिट जाता है और परम शान्तिका अनुभव होता है॥ ३७॥✎ 1736

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1736 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कलि-युगमें → कलियुगमें

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