श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.42

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य

त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः।

विकर्म यच्चोत्पतितं कथंचिद्

धुनोति सर्वं हृदि सन्‍निविष्टः॥ ४२

svapādamūlaṃ bhajataḥ priyasya

tyaktānyabhāvasya hariḥ pareśaḥ|

vikarma yaccotpatitaṃ kathaṃcid

dhunoti sarvaṃ hṛdi sanniviṣṭaḥ|| 42

अर्थ

जो प्रेमी भक्त अपने प्रियतम भगवान्‌के चरण-कमलोंका अनन्यभावसे—दूसरी भावनाओं, आस्थाओं, वृत्तियों और प्रवृत्तियोंको छोड़कर—भजन करता है, उससे, पहली बात तो यह है कि पापकर्म होते ही नहीं; परन्तु यदि कभी किसी प्रकार हो भी जायँ तो परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसके हृदयमें बैठकर वह सब धो-बहा देते और उसके हृदयको शुद्ध कर देते हैं॥ ४२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें