श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं

संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्‍निवच्छ्रीः।

यः सुप्रणीतममुयार्हणमाददन्‍नो

भूयात् सदाङ्‌घ्रिरशुभाशयधूमकेतुः॥ १२

paryuṣṭayā tava vibho vanamālayeyaṃ

saṃspardhinī bhagavatī pratipatnivacchrīḥ|

yaḥ supraṇītamamuyārhaṇamādadanno

bhūyāt sadāṅghriraśubhāśayadhūmaketuḥ|| 12

अर्थ

प्रभो! यह भगवती लक्ष्मी आपके वक्षः-स्थलपर मुरझायी हुई बासी वनमालासे भी सौतकी तरह स्पर्द्धा रखती हैं। फिर भी आप उनकी परवा न कर भक्तोंके द्वारा इस बासी मालासे की हुई पूजा भी प्रेमसे स्वीकार करते हैं। ऐसे भक्तवत्सल प्रभुके चरणकमल सर्वदा हमारी विषयवासनाओंको जलानेवाले अग्‍निस्वरूप हों॥ १२॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

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