श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-

भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः ।

पत्‍न्यस्तु षोडशसहस्रमनंगबाणै-

र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्यः॥ १८

smāyāvalokalavadarśitabhāvahāri-

bhrūmaṇḍalaprahitasauratamantraśauṇḍaiḥ |

patnyastu ṣoḍaśasahasramanaṃgabāṇai-

ryasyendriyaṃ vimathituṃ karaṇairna vibhvyaḥ|| 18

अर्थ

सोलह हजारसे अधिक रानियाँ आपके साथ रहती हैं। वे सब अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे युक्त मनोहर भौंहोंके इशारेसे और सुरतालापोंसे प्रौढ़ सम्मोहक कामबाण चलाती हैं और कामकलाकी विविध रीतियोंसे आपका मन आकर्षित करना चाहती हैं; परंतु फिर भी वे अपने परिपुष्ट कामबाणोंसे आपका मन तनिक भी न डिगा सकीं, वे असफल ही रहीं॥ १८॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें