श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

वातरशना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः।

ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमलाः॥ ४७

vātaraśanā ya ṛṣayaḥ śramaṇā ūrdhvamanthinaḥ|

brahmākhyaṃ dhāma te yānti śāntāḥ saṃnyāsino'malāḥ|| 47

अर्थ

हम जानते हैं कि मायाको पार कर लेना बहुत ही कठिन है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दिगम्बर रहकर और आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करके अध्यात्मविद्याके लिये अत्यन्त परिश्रम करते हैं। इस प्रकारकी कठिन साधनासे उन संन्यासियोंके हृदय निर्मल हो पाते हैं और तब कहीं वे समस्त वृत्तियोंकी शान्तिरूप नैष्कर्म्य-अवस्थामें स्थित होकर आपके ब्रह्मनामक धामको प्राप्त होते हैं॥ ४७॥

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